Monday, March 12, 2018

पति एक नंबर के झूठे होते हैं


सच में पति एक नंबर के झूठे होते हैं

कहते हैं छोड़कर चला जाऊँगा किसी दिन
और एक दिन भी
हमारे बिना रह नहीं पाते हैं

सारा दिन फोन पर लगी रहती हो
नोकिया बारहसौ लाऊँगा कहकर
लेटेस्ट स्मार्ट फोन दिलाते हैं

जितना चाहे खाने में नुक्स निकालें
मगर दावतें छोड़कर
खाना घर का ही खाते हैं

हमारी ख्वहिशों पर
मजबूरियाँ और खर्चे गिनाते हैं
पर जब तक पूरी न करदें वो भी चैन नहीं पाते हैं

हमारी खुशी पर वो जहाँ की दौलत लुटाते हैं
पर हमारे एक आँसू पे
धड़कन और साँसें थाम जाते हैं

अपनी गलती पे भी वो
अक्सर हमको ही झुकाते हैं
मगर रोता है दिल उनका हमें जब आँसू आते हैं

कोई आफिस में कोई सुंदर सी है
बता कर जब जलाते हैं
निगाहों में हमीं होते हैं जब वो मुस्कुराते हैं

बहिन भाई दोस्त रिश्तेदार
सभी को यूँ तो चाहते हैं
पर सोचकर पत्नी के सिवा सबको भूल जाते हैं

बड़े ही सख्त रहते हैं, जीतते हैं दबाते हैं
मगर दिल ही दिल में जीते हैं
जिसके लिए उसी से हार जाते हैं

जब तक जवान हो तुम,
तो बुड़ढी तुम्हे बताते हैं
बुढ़ापे में संगिनी को हसीन बेहद बताते हैं
सच में पति एक नंबर के झूठे होते हैं

Friday, March 9, 2018

पता हीं नहीं चला

*💙 समय चला, पर कैसे चला... 💙*
            *पता ही नहीं चला...*

       *जिन्दगी कैसे गुजरती गई...*
            *पता ही नहीं चला...*
_______________________________
🙏कविता के लेखक को मेरा प्रणाम🙏
_______________________________

ज़िन्दगी की आपाधापी में,
कब निकली उम्र हमारी,
*पता ही नहीं चला।*

कंधे पर चढ़ने वाले बच्चे,
कब कंधे तक आ गए,
*पता ही नहीं चला।*

किराये के घर से
शुरू हुआ सफर,
अपने घर तक आ गया,
*पता ही नहीं चला।*

साइकिल के
पैडल मारते हुए,
हांफते थे उस वक़्त,
अब तो
कारों में घूमने लगे हैं,
*पता ही नहीं चला।*

हरे भरे पेड़ों से
भरे हुए जंगल थे तब,
कब हुए कंक्रीट के,
*पता ही नहीं चला।*

कभी थे जिम्मेदारी
माँ बाप की हम,
कब बच्चों के लिए
हुए जिम्मेदार हम,
*पता ही नहीं चला।*

एक दौर था जब
दिन में भी बेखबर सो जाते थे,
कब रातों की उड़ गई नींद,
*पता ही नहीं चला।*

बनेंगे कब हम माँ बाप
सोचकर कटता नहीं था वक़्त,
कब हमारे बच्चे बच्चों वाले होने योग्य हो गए,
*पता ही नहीं चला।*

जिन काले घने
बालों पर इतराते थे हम,
कब रंगना शुरू कर दिया,
*पता ही नहीं चला।*

होली और दिवाली मिलते थे,
यार, दोस्तों और रिश्तेदारों से,
कब छीन ली प्यार भरी
मोहब्बत आज के दौर ने,
*पता ही नहीं चला।*

दर दर भटके हैं,
नौकरी की खातिर ,
कब रिटायर होने का समय आ गया
*पता ही नहीं चला।*

बच्चों के लिए
कमाने, बचाने में
इतने मशगूल हुए हम,
कब बच्चे हमसे हुए दूर,
*पता ही नहीं चला।*

भरे पूरे परिवार से
सीना चौड़ा रखते थे हम,
कब परिवार हम दो पर सिमटा,
*।।। पता ही नहीं चला ।।।*

बचपन

बचपन मे 1 रु. की पतंग के पीछे
२ की.मी. तक भागते थे...
न जाने कीतने चोटे लगती थी...

वो पतंग भी हमे बहोत दौड़ाती थी...

आज पता चलता है,
दरअसल वो पतंग नहीं थी;
एक चेलेंज थी...

खुशीओं को हांसिल करने के लिए दौड़ना पड़ता है...
वो दुकानो पे नहीं मिलती...

शायद यही जिंदगी की दौड़ है ...!!!😊

जब  बचपन  था,  तो  जवानी  एक  ड्रीम  था...
जब  जवान  हुए,  तो  बचपन  एक  ज़माना  था... !!😊

जब  घर  में  रहते  थे,  आज़ादी  अच्छी  लगती  थी...

आज  आज़ादी  है,  फिर  भी  घर  जाने  की   जल्दी  रहती  है... !!😊

कभी  होटल  में  जाना  पिज़्ज़ा,  बर्गर  खाना  पसंद  था...

आज  घर  पर  आना  और का  खाना  पसंद  है... !!!😊

स्कूल  में  जिनके  साथ  झगड़ते  थे,  आज  उनको  ही  इंटरनेट  पे  तलाशते  है... !! 😊

ख़ुशी  किसमे  होतीं है,  ये  पता  अब  चला  है...

बचपन  क्या  था,  इसका  एहसास  अब  हुआ  है...

काश  बदल  सकते  हम  ज़िंदगी  के  कुछ  साल..

.काश  जी  सकते  हम,  ज़िंदगी  फिर  एक  बार...!!

👘 जब हम अपने शर्ट में हाथ छुपाते थे
और लोगों से कहते फिरते थे देखो मैंने
अपने हाथ जादू से हाथ गायब कर दिए
|🌀🌀

✏जब हमारे पास चार रंगों से लिखने
वाली एक पेन हुआ करती थी और हम
सभी के बटन को एक साथ दबाने
की कोशिश किया करते थे |❤💚💙💜

👻 जब हम दरवाज़े के पीछे छुपते थे
ताकि अगर कोई आये तो उसे डरा सके..👥

👀जब आँख बंद कर सोने का नाटक करते
थे ताकि कोई हमें गोद में उठा के बिस्तर तक पहुचा दे |

🚲सोचा करते थे की ये चाँद
हमारी साइकिल के पीछे पीछे
क्यों चल रहा हैं |🌙🚲

🔦💡On/Off वाले स्विच को बीच में
अटकाने की कोशिश किया करते थे |

🍏🍎🍉🍑🍈 फल के बीज को इस डर से नहीं खाते
थे की कहीं हमारे पेट में पेड़ न उग जाए |

🍰🎂🍧🏆🎉🎁 बर्थडे सिर्फ इसलिए मनाते थे
ताकि ढेर सारे गिफ्ट मिले |

🔆फ्रिज को धीरे से बंद करके ये जानने
की कोशिश करते थे की इसकी लाइट
कब बंद होती हैं |

🎭  सच , बचपन में सोचते हम बड़े
क्यों नहीं हो रहे ?

और अब सोचते हम बड़े क्यों हो गए ?⚡⚡

🎒🎐ये दौलत भी ले लो..ये शोहरत भी ले लो💕

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी...

मगर मुझको लौटा दो बचपन
का सावन ....☔

वो कागज़
की कश्ती वो बारिश का पानी..🌊🌊🌊

Bachpan ki storyes 🔽🔽🔽🔽🔽🔽

                 Old hits
 

बचपन कि ये लाइन्स .
जिन्हे हम दिल से गाते
गुनगुनाते थे ..
और खेल खेलते थे ..!!
तो याद ताज़ा कर लीजिये ...!!

▶  मछली जल की रानी है,
       जीवन उसका पानी है।
       हाथ लगाओ डर जायेगी
       बाहर निकालो मर जायेगी।

***********

▶  आलू-कचालू बेटा कहाँ गये थे,
       बन्दर की झोपडी मे सो रहे थे।
       बन्दर ने लात मारी रो रहे थे,
       मम्मी ने पैसे दिये हंस रहे थे।

************

▶  आज सोमवार है,
       चूहे को बुखार है।
       चूहा गया डाक्टर के पास,
       डाक्टर ने लगायी सुई,
       चूहा बोला उईईईईई।

**********

▶  झूठ बोलना पाप है,
       नदी किनारे सांप है।
       काली माई आयेगी,
       तुमको उठा ले जायेगी।

**********

▶  चन्दा मामा दूर के,
       पूए पकाये भूर के।
       आप खाएं थाली मे,
       मुन्ने को दे प्याली में।

**********

▶  तितली उड़ी,
       बस मे चढी।
       सीट ना मिली,
       तो रोने लगी।
       ड्राईवर बोला,
       आजा मेरे पास,
       तितली बोली ” हट बदमाश “।

****************

▶  मोटू सेठ,
       पलंग पर लेट ,
       गाडी आई,
       फट गया पेट

******************

Saturday, February 24, 2018

The Sridevi who will never end

बॉलीवुड अभिनेत्री श्रीदेवी का निधन हो गया है।
54 वर्षीय अभिनेत्री दुबई में भांजे की शादी में गई थी, वहीं उन्हें हार्ट अटैक हुआ और वह दुनिया को छोड़कर चली गईं ।शनिवार रात 12 बजे के बाद श्रीदेवी को हार्ट अटैक आया था ।हादसे के वक्त उनके पति बोनी कपूर और छोटी बेटी उनके साथ थी।1963 में जन्मी श्रीदेवी ने 1967 में  एक बाल कलाकार के रूप में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी।श्रीदेवी ने हिंदी के अलावा तेलगु, तमिल, कन्नड़ और मलयाली फिल्मों में भी काम किया. वर्ष 2012 में उन्होंने इंग्लिश-विंग्लिश के साथ बॉलीवुड में कमबैक किया था।श्रीदेवी को 2013 में चौथे उच्चतम नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया था...

नालायक

देर रात अचानक ही पिता जी की तबियत बिगड़ गयी।
आहट पाते ही उनका नालायक बेटा उनके सामने था।
माँ ड्राईवर बुलाने की बात कह रही थी, पर उसने सोचा अब इतनी रात को इतना जल्दी ड्राईवर कहाँ आ पायेगा ?????

यह कहते हुये उसने सहज जिद और अपने मजबूत कंधो के सहारे बाऊजी को कार में बिठाया और तेज़ी से हॉस्पिटल की ओर भागा।

बाउजी दर्द से कराहने के साथ ही उसे डांट भी रहे थे

"धीरे चला नालायक, एक काम जो इससे ठीक से हो जाए।"

नालायक बोला
"आप ज्यादा बातें ना करें बाउजी, बस तेज़ साँसें लेते रहिये, हम हॉस्पिटल पहुँचने वाले हैं।"

अस्पताल पहुँचकर उन्हे डाक्टरों की निगरानी में सौंप,वो बाहर चहलकदमी करने लगा

, बचपन से आज तक अपने लिये वो नालायक ही सुनते आया था।
उसने भी कहीं न कहीं अपने मन में यह स्वीकार कर लिया था की उसका नाम ही शायद नालायक ही हैं ।

तभी तो स्कूल के समय से ही घर के लगभग सब लोग कहते थे की नालायक फिर से फेल हो गया।

नालायक को अपने यहाँ कोई चपरासी भी ना रखे।

कोई बेवकूफ ही इस नालायक को अपनी बेटी देगा।

शादी होने के बाद भी वक्त बेवक्त सब कहते रहते हैं की इस
बेचारी के भाग्य फूटें थे जो इस नालायक के पल्ले पड़ गयी।

हाँ बस एक माँ ही हैं जिसने उसके असल नाम को अब तक जीवित रखा है, पर आज अगर उसके बाउजी को कुछ हो गया तो शायद वे भी..

इस ख़याल के आते ही उसकी आँखे छलक गयी और वो उनके लिये हॉस्पिटल में बने एक मंदिर में प्रार्थना में डूब गया। प्रार्थना में शक्ति थी या समस्या मामूली, डाक्टरों ने सुबह सुबह ही बाऊजी को घर जाने की अनुमति दे दी।

घर लौटकर उनके कमरे में छोड़ते हुये बाऊजी एक बार फिर चीखें,

"छोड़ नालायक ! तुझे तो लगा होगा कि बूढ़ा अब लौटेगा ही नहीं।"

उदास वो उस कमरे से निकला, तो माँ  से अब रहा नहीं गया, "इतना सब तो करता है, बावजूद इसके आपके लिये वो नालायक ही है ???

सागर और अभिषेक दोनो अभी तक सोये हुए हैं उन्हें तो अंदाजा तक नही हैं की रात को क्या हुआ होगा .....बहुओं ने भी शायद उन्हें बताना उचित नही समझा होगा ।

यह बिना आवाज दिये आ गया और किसी को भी परेशान नही किया

भगवान न करे कल को कुछ अनहोनी हो जाती तो ?????

और आप हैं की ????

उसे शर्मिंदा करने और डांटने का एक भी मौका नही छोड़ते ।

कहते कहते माँ रोने लगी थी

इस बार बाऊजी ने आश्चर्य भरी नजरों से उनकी ओर देखा और फिर नज़रें नीची करली

माँ रोते रोते बोल रही थी
अरे, क्या कमी है हमारे  बेटे में ?????

हाँ मानती हूँ पढाई में थोङा कमजोर था ....
तो क्या ????
क्या सभी होशियार ही होते हैं ??

वो अपना परिवार, हम दोनों को, घर-मकान, पुश्तैनी कारोबार, रिश्तेदार और रिश्तेदारी सब कुछ तो बखूबी सम्भाल रहा है

जबकि  बाकी दोनों जिन्हें आप लायक समझते हैं वो बेटे सिर्फ अपने बीबी और बच्चों के अलावा ज्यादा से ज्यादा अपने ससुराल का ध्यान रखते हैं ।

कभी पुछा आपसे की आपकी तबियत कैसी हैं ??????

और आप हैं की ....

बाऊजी बोले संगीता तुम भी मेरी भावना नही समझ पाई ????

मेरे शब्द ही पकङे न ??

क्या तुझे भी यहीं लगता हैं की इतना सब के होने बाद भी  इसे बेटा कह के नहीं बुला पाने का, गले से नहीं लगा पाने का दुःख तो मुझे नही हैं ????

क्या मेरा दिल पत्थर का हैं ??????

हाँ संगीता सच कहूँ दुःख तो मुझे भी होता ही है, पर उससे भी अधिक डर लगता है कि कहीं ये भी उनकी ही तरह *लायक* ना बन जाये।

इसलिए मैं इसे इसकी पूर्णताः का अहसास इसे अपने जीते जी तो कभी नही होने दूगाँ ....

माँ चौंक गई .....

ये क्या कह रहे हैं आप ???

हाँ संगीता ...यहीं सच हैं

अब तुम चाहो तो इसे मेरा स्वार्थ ही कह लो। "कहते हुये उन्होंने रोते हुए नजरे नीची किये हुए अपने हाथ माँ की तरफ जोड़ दिये जिसे माँ ने झट से अपनी हथेलियों में भर लिया।

और कहा अरे ...अरे ये आप क्या कर रहे हैं
मुझे क्यो पाप का भागी बना रहे हैं ।
मेरी ही गलती हैं मैं आपको इतने वर्षों में भी पूरी तरह नही समझ पाई ......

और दूसरी ओर दरवाज़े पर वह नालायक खड़ा खङा यह सारी बातचीत सुन रहा था वो भी आंसुओं में तरबतर हो गया था।

उसके मन में आया की दौड़ कर अपने बाऊजी के गले से लग जाये पर ऐसा करते ही उसके बाऊजी झेंप जाते,
यह सोच कर वो अपने कमरे की ओर दौड़ गया।

कमरे तक पहुँचा भी नही था की बाऊजी की आवाज कानों में पङी..

अरे नालायक .....वो दवाईयाँ कहा रख दी
गाड़ी में ही छोड़ दी क्या ??????

कितना भी समझा दो इससे एक काम भी ठीक से नही होता ....

नालायक झट पट आँसू पौछते हुये गाड़ी से दवाईयाँ निकाल कर बाऊजी के कमरे की तरफ दौङ गया ।

😊😊😊😊😊😊😊😊

Friday, February 23, 2018

दर्द बिकता रहा

*दर्द कागज़ पर,*
          *मेरा बिकता रहा,*
*मैं बैचैन था,*
          *रातभर लिखता रहा..*

*छू रहे थे सब,*
          *बुलंदियाँ आसमान की,*
*मैं सितारों के बीच,*
          *चाँद की तरह छिपता रहा..*

*दरख़्त होता तो,*
          *कब का टूट गया होता,*
*मैं था नाज़ुक डाली,*
          *जो सबके आगे झुकता रहा..*

*बदले यहाँ लोगों ने,*
         *रंग अपने-अपने ढंग से,*
*रंग मेरा भी निखरा पर,*
         *मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा..*

*जिनको जल्दी थी,*
         *वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,*
*मैं समन्दर से राज,*
         *गहराई के सीखता रहा..!!*

Sunday, February 18, 2018

I liked the Tips by H.chauhan

What are some of the best life tips? by Himanshu Chauhan https://www.quora.com/What-are-some-of-the-best-life-tips/answer/Himanshu-Chauhan-88?share=e3024632&srid=h5t7z