Friday, June 19, 2026

aur bhi log hai...

Zindagi ke samandar me jab pareshaniyon ki lahrein hume gher leti hain, toh aksar do tarah ki baaten hoti hain. Pehli—hume lagta hai ki hum bilkul akele hain aur sara bojh humare hi kandhon par hai. Doosri—humara aatm-vishwas (self-confidence) kabhi-kabhi aatm-mugdhata (overconfidence) me badal jata hai, jahan hume lagta hai ki sirf hum hi sabse sahi hain aur hume kisi ki salah ki zaroorat nahi hai.
​Isi kashmakash aur aatm-manthan ke beech, meri kalam se ye do linen nikli hain:
​"Aur bhi log hai samajhadar yaha,
ek ham hi nahi akele majhdhar me."
​Ye shayari sirf do linen nahi hain, balki zindagi ko sahi dhang se jeene aur mushkilon se ladne ka ek behtareen formula hain. Aaiye iske gehre maane ko samajhte hain:
​1. Ek Sukoon: Hum Is Ladai Me Akele Nahi Hain
​Jab hum bahar se logon ko dekhte hain, toh unki zindagi badi perfect lagti hai. Par sach ye hai ki har samajhdar aur suljha hua insaan bhi apni zindagi ke kisi na kisi kone me ek chupchap ladai lad raha hota hai.
​Zindagi ka 'majhdhar' har kisi ke liye alag ho sakta hai—kisi ke liye career, kisi ke liye parivar, toh kisi ke liye dimaag me chal raha koi tufan. Jab hume ye ehsaas hota hai ki is samandar me aur bhi bohot si kashtiyan hain jo hichkole kha rahi hain, toh humare andar ka akelapan kam hota hai aur ek anokha sukoon milta hai.
​2. Sahi Balance: Confidence Aur Bevkufi Ke Beech Ka Dhaga
​Aatm-vishwas hona behad zaroori hai, lekin is galatfaymi me rehna ki sirf hum hi sabse akalmand hain—hume badi bevkufi ki taraf le ja sakta hai.
​Asal samajhdari apne ego (aham) ko pehchanne me hai. Jab hum ye maante hain ki "aur bhi log hain samajhdar yahan", toh humara dimaag naye vicharon aur sahi salah ke liye khulta hai. Jo kinare par baith kar sirf tamasha dekhte hain, unhe kabhi samandar ki gehrai ka andaza nahi hota. Agar aap aaj majhdhar me hain, toh aap rasta banane ki koshish kar rahe hain, par us raste par hosh khona bevkufi hogi.
​3. Anubhav Ka Haath Thamiye aur Dhairya Rakhiye
​Is duniya me hazaron log hain jo unhi raaston se guzar chuke hain jinpar aaj hum chal rahe hain. Unhone bhi thokhrein khayi hain aur unhone bhi majhdhar dekha hai.
​Agar hum thoda rukkar, un samajhdar logon ke anubhav (experience) se seekhein, toh hum un galtiyon se bach sakte hain jo humara bada nuksaan kar sakti hain. Aur is seekh ke liye sabse bada hathiyar hai—Dhairya (Patience). Dhairya hume jaldbazi me galat faisle lene se rokta hai. Ye hume mouka deta hai ki hum seekhein, samjhein, aur phir poore hosh ke sath apni kashti ko kinare ki taraf badhayein.
​Aakhri Baat (Conclusion)
​Apne aap par poora bharosa rakhiye, par sath hi ye yaad rakhiye ki seekhne ki gunjaish hamesha rehti hai. Agli baar jab aap kisi uljhan me hon, toh thoda thahriye. Gahri saans lijiye, apne aas-paas ke samajhdar aur anubhav-shali logon ko dekhiye, unse seekh lijiye, dhairya rakhiye aur phir aage badhiye.
​Kyunki majhdhar se nikalne ka rasta sirf zidd se nahi, balki hosh, hamdardi aur sahi samajhdari se banta hai.
​Aapka is baare me kya khayal hai? Kya aapne bhi kabhi kisi ke anubhav se seekh kar apna rasta aasan kiya hai? Mujhe comment section me zaroor batayein!

Monday, June 21, 2021

you are under his camera

कृपया सचेत रहिये क्योन्कि


*आप कैमरे 🎥 की नजर में है।*

एक दिन सुबह सुबह दरवाजे की घंटी बजी । दरवाजा खोला तो देखा एक आकर्षक कद- काठी का व्यक्ति चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान लिए खड़ा है ।

*मैंने कहा, "जी कहिए.."

तो उसने कहा,

अच्छा जी, आप तो  रोज़ हमारी ही गुहार लगाते थे,

मैंने  कहा

"माफ कीजिये, भाई साहब ! मैंने पहचाना नहीं, आपको..."

तो वह कहने लगे,

"भाई साहब, मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें साहेब बनाया है... अरे ईश्वर हूँ.., ईश्वर.. तुम हमेशा कहते थे न कि नज़र मे बसे हो पर नज़र नही आते.. लो आ गया..! अब आज पूरे दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।"

मैंने चिढ़ते हुए कहा,

"ये क्या मज़ाक है?"

"अरे मज़ाक नहीं है, सच है। सिर्फ़ तुम्हे ही नज़र आऊंगा। तुम्हारे सिवा कोई देख- सुन नही पायेगा, मुझे।"

कुछ कहता इसके पहले पीछे से माँ आ गयी.. "अकेला ख़ड़ा- खड़ा  क्या कर रहा है यहाँ, चाय तैयार है , चल आजा अंदर.."

अब उनकी बातों पे थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था, और मन में थोड़ा सा डर भी था.. मैं जाकर सोफे पर बैठा ही था, तो बगल में वह आकर बैठ गए। चाय आते ही जैसे ही पहला घूँट पिया मैं गुस्से से चिल्लाया,

"अरे मां..ये हर रोज इतनी  चीनी ?"

इतना कहते ही ध्यान आया कि अगर ये सचमुच में ईश्वर है तो इन्हें कतई पसंद नही आयेगा कि कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे। अपने मन को शांत किया और समझा भी  दिया कि 'भई, तुम नज़र में हो आज... ज़रा ध्यान से।'

बस फिर मैं जहाँ- जहाँ... वह मेरे पीछे- पीछे पूरे घर में... थोड़ी देर बाद नहाने के लिये जैसे ही मैं बाथरूम की तरफ चला, तो उन्होंने भी कदम बढ़ा दिए..

मैंने कहा,

"प्रभु, यहाँ तो बख्श दो..."

खैर, नहा कर, तैयार होकर मैं पूजा घर में गया, यकीनन पहली बार तन्मयता से प्रभु वंदन किया, क्योंकि आज अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी.. फिर आफिस के लिए निकला, अपनी कार में बैठा, तो देखा बगल में  महाशय पहले से ही बैठे हुए हैं। सफ़र शुरू हुआ तभी एक फ़ोन आया, और फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया, 'तुम नज़र मे हो।'

कार को साइड मे रोका, फ़ोन पर बात की और बात करते- करते कहने ही वाला था कि 'इस काम के ऊपर के पैसे लगेंगे' ...पर ये  तो गलत था, : पाप था तो प्रभु के सामने कैसे कहता तो एकाएक ही मुँह से निकल गया,"आप आ जाइये । आपका काम हो  जाएगा, आज।"

फिर उस दिन आफिस मे ना स्टाफ पर गुस्सा किया, ना किसी कर्मचारी से बहस की 25 - 50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जाती थी मुँह से, पर उस दिन  सारी गालियाँ, 'कोई बात नही, इट्स ओके...'मे तब्दील हो गयीं।

   वह पहला दिन था जब क्रोध, घमंड, किसी की बुराई, लालच, अपशब्द , बेईमानी, झूठ ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा नही बनें।

शाम को आफिस से निकला, कार में बैठा, तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया...

"प्रभु सीट बेल्ट लगा लें, कुछ नियम तो आप भी निभायें... उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी..."

*घर पर रात्रि भोजन जब परोसा गया तब शायद पहली बार मेरे मुख से निकला,

"प्रभु, पहले आप लीजिये ।"

और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह मे रखा। भोजन के बाद माँ बोली,

"पहली बार खाने में कोई कमी नही निकाली आज तूने। क्या बात है ? सूरज पश्चिम से निकला है क्या, आज?"

मैंने कहाँ,

"माँ आज सूर्योदय मन में हुआ है... रोज़ मैं महज खाना खाता था, आज प्रसाद ग्रहण किया है माँ, और प्रसाद मे कोई कमी नही होती।"

थोड़ी देर टहलने के बाद अपने कमरे मे गया, शांत मन और शांत दिमाग  के साथ तकिये पर अपना सिर रखा तो ईश्वर ने प्यार से सिर पर हाथ फिराया और कहा,

"आज तुम्हे नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी किताब के सहारे की ज़रुरत नहीं है।"

गहरी नींद गालों पे थपकी से उठी...

"कब तक सोयेगा .., जाग जा अब।"

माँ की आवाज़ थी... सपना था शायद... हाँ, सपना ही था पर नीँद से जगा गया... अब समझ में आ गया उसका इशारा...

 "तुम नज़र में हो...।"

जिस दिन ये समझ गए कि "वो" देख रहा है, सब कुछ ठीक हो जाएगा। सपने में आया एक विचार भी आंखे खोल सकता है।

बस हमेशा याद रखो कि.....

हम सांसारिक कैमरे की नही बल्कि प्रभु के कैमरे की नजर में हर समय हैं..!!
  जय जय श्री राधे🙏

Wednesday, July 29, 2020

ग्राहक और इन्सान

|| *"प्रेरणादायक कहानी"* ||

बनारस में एक चर्चित दूकान पर लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब दोस्त-यार आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई और हंसी-मजाक में लगे ही थे कि एक लगभग 70-75 साल की बुजुर्ग स्त्री पैसे मांगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गई।

उनकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी। नेत्र भीतर को धंसे हुए किन्तु सजल थे। उनको देखकर मन मे न जाने क्या आया कि मैने जेब मे सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया :

 *"दादी लस्सी पियोगी ??"* 

मेरी इस बात पर दादी कम अचंभित हुईं और मेरे मित्र अधिक। क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 5 या 10 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 25 रुपए की एक है। इसलिए लस्सी पिलाने से मेरे गरीब हो जाने की और उस बूढ़ी दादी के द्वारा मुझे ठग कर अमीर हो जाने की संभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी।

 *दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी* और अपने पास जो मांग कर जमा किए हुए 6-7 रुपए थे, वो अपने कांपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए। मुझे कुछ समझ नही आया तो मैने उनसे पूछा:

"ये किस लिए..??"

 *"इनको मिलाकर मेरी लस्सी के पैसे चुका देना बाबूजी !!"* 

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था.. रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी।

एकाएक मेरी आंखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा.. उन्होने अपने पैसे वापस मुट्ठी मे बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गई।

अब मुझे अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहां पर मौजूद दुकानदार, अपने दोस्तों और कई अन्य ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कह सका।

डर था कि कहीं कोई टोक ना दे.. कहीं किसी को एक भीख मांगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बिठाए जाने पर आपत्ति न हो जाये.. लेकिन वो कुर्सी जिस पर मैं बैठा था, मुझे काट रही थी..

लस्सी कुल्लड़ों मे भरकर हम सब मित्रों और बूढ़ी दादी के हाथों मे आते ही *मैं अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी* के *पास ही जमीन पर बैठ गया* क्योंकि ऐसा करने के लिए तो मैं स्वतंत्र था...इससे किसी को आपत्ति नही हो सकती थी... हां! मेरे *दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा..* 

लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के *मालिक ने आगे बढ़कर दादी को* *उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया* और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा :
 *"ऊपर बैठ जाइए साहब! मेरे यहां ग्राहक तो बहुत आते हैं, किन्तु इंसान तो कभी-कभार ही आता है।"*

Monday, June 29, 2020

अद्भुत कथा - कान की व्यथा

हेलो दोस्तों, 
मैं हूँ कान। हम दो हैं। जुड़वां भाई हैं, लेकिन हमारी किस्मत ही ऐसी है कि आज तक हमने अपने दूसरे भाई को देखा तक नहीं। 

पता नहीं कौन से श्राप के कारण हमें विपरित दिशा में चिपका कर भेजा गया है। दुख सिर्फ इतना ही नहीं है। हमें जिम्मेदारी सिर्फ सुनने की मिली है, गालियाँ हों या तालियाँ, अच्छा हो या बुरा, सब हम ही सुनते हैं।

मगर बाद में धीरे धीरे हमें खूंटी समझा जाने लगा।
चश्मे का बोझ डाला गया, फ्रेम की डण्डी को हम पर फँसाया गया। ये दर्द सहा हमने।
क्यों भाई!
चश्मे का मामला आंखो का है तो हमें बीच में घसीटने का मतलब क्या है? 
बोलते नहीं तो क्या हुआ, सुनते तो हैं ना।
हर जगह बोलने वाले ही क्यों आगे रहते है।
बचपन में पढ़ाई में किसी का दिमाग काम न करे तो मास्टर जी हमें ही मरोड़ते हैं।

जवान हुए तो आदमी, औरतें सबने सुन्दर सुन्दर लौंग, बालियाँ, झुमके आदि बनवाकर हम पर ही लटकाये।
छेदन हमारा हुआ, तारीफ मुँह की J। 

और तो और श्रृंगार देखो, आँखों के लिए काजल, मुँह के लिए क्रीमें, होठों के लिए लिपस्टिक, हमने आजतक कुछ माँगा हो तो बताओ।

कभी किसी कवि ने, शायर ने, कोई तारीफ ही की हो तो बताओ। इनकी नजर में आँखे, होंठ, गाल, ये ही सब कुछ है। हम तो जैसे किसी मृत्युभोज की बची खुची दो पूड़ियाँ हैं, जिसे उठाकर चेहरे के साइड में चिपका दिया।

और तो और, कई बार बालों के चक्कर में हम पर भी कट लगते हैं। हमें डिटाॅल लगाकर पुचकार दिया जाता है।
किसको कहें। बातें बहुत सी हैं, किससे कहूँ! 
दर्द बाँटने से मन हल्का हो जाता है। 
आँख से कहूँ तो वे आँसू टपकाती हैं।
नाक से कहूँ तो वो नेटा बहाता है।
मुँह से कहूँ तो वो हाय हाय करके रोता है।

और बताउँ,

पण्डित जी का जनेऊ, टेलर मास्टर की पेंसिल, मिस्त्री की बची हुई गुटखे की पुड़िया, मोबाईल का ईयरफोन सब हम ही सम्भालते हैं।

और, आजकल ये नया नया मास्क का झंझट भी हम ही झेल रहे हैं। ढकना मुंह नाक को है, लेकिन सजा मुझे दी जाती है। कान नहीं, पक्की खूँटियाँ हैं हम। और भी कुछ टाँगना, लटकाना हो तो लाओ हम दोनों भाई तैयार हैं।

*लटका लो।*
☺️

Sunday, June 21, 2020

पूण्य का मोल


एक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला, वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रह'ता था।

एक यज्ञ में उसने अपना सबकुछ दान कर दिया। अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे।

व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं। वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं।

आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए, जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके।

पुण्य बेचने की व्यापारी की बिलकुल इच्छा नहीं थी, लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं।

व्यापारी चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे। उसे भूख लगी थी।

नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए। उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया तुरंत के जन्मे अपने तीन बच्चों के साथ आ खड़ी हुई।

कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे। बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे, इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी। 
व्यापारी को दया आ गई। उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दे दिया।
कुतिया पलक झपकते रोटी चट कर गई लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी।

व्यापारी ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चारो रोटियां कुतिया को खिला दीं। खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा।

व्यापारी ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है। सेठ व्यस्त था। उसने कहा कि शाम को आओ।

दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यापारी अपने पुण्य बेचने आया है। उसका कौन सा पुण्य खरीदूं।

सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध थी। उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है।

उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है। वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है।

व्यापारी शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया। सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं।
व्यापारी हंसने लगा। उसने कहा कि अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता!

सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है। मुझे वही पुण्य चाहिए।
व्यापारी वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह व्यापारी को चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा।

चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया। दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे।
पलड़ा हिला तक नहीं। दूसरी पोटली मंगाई गई। फिर भी पलड़ा नहीं हिला।

कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो व्यापारी ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता।

व्यापारी खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा। उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए।

जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थी, वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और साथ में रखकर गांठ बांध दी।

घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले तो उसने थैली दिखाई और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे। इसके बाद गांव में कुछ उधार मांगने चला गया।

इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैली देखी थी उसे सब्र नहीं हो रहा था। पति के जाते ही उसने थैली खोली।
उसकी आंखे फटी रह गईं। थैली हीरे-जवाहरातों से भरी थी।

व्यापारी घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया ? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए ??
व्यापारी को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही लेकिन, उसके चेहरे की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था।

व्यापारी ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात। पत्नी ने लाकर पोटली उसके सामने उलट दी। उसमें से बेशकीमती रत्न गिरे। व्यापारी हैरान रह गया।
फिर उसने पत्नी को सारी बात बता दी। पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया।

दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर व्यापार शुरू करेंगे। व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे।

ईश्वर आपकी परीक्षा लेता है। परीक्षा में वह सबसे ज्यादा आपके उसी गुण को परखता है जिस पर आपको गर्व हो।
अगर आप परीक्षा में खरे उतर जाते हैं तो ईश्वर वह गुण आपमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं।

अगर परीक्षा में उतीर्ण न हुए तो ईश्वर उस गुण के लिए योग्य किसी अन्य व्यक्ति की तलाश में लग जाते हैं।

इसलिए विपत्तिकाल में भी भगवान पर भरोसा रखकर सही राह चलनी चाहिए। आपके कंकड़-पत्थर भी अनमोल रत्न हो सकते हैं।

   *न डर रे मन दुनिया से*
   *यहाँ किसी के चाहने से नहीं*
   *किसी का बुरा होता है,*
   *मिलता है वही, जो हमने बोया होता है,*
   *कर पुकार उस प्रभु के आगे.. क्योकि सब कुछ उसी के बस में*
.  *होता है।।*

Saturday, June 20, 2020

नाक की पगड़ी

*😷  "नाक की पगड़ी" 😷*



*कई सदियों से नाक और सिर में*
*यह तकरार थी तगड़ी,*
*कहती थी नाक, जब मुझसे है इज़्ज़त,*
*तो फिर सिर के पास ही क्यों पगड़ी !!*

*नाक का कहना था,*
*कि सभी मुहावरों में है मेरा फसाना,*
*चाहे वो नाक कटना हो,*
*नाक नीची होना,*
*या हो फिर, नाकों चने चबाना !*

*क्यों फिर सर को ही है केवल,*
*पगड़ी और टोपी का अधिकार,*
*जबकि इंसान की इज़्ज़त का,*
*मुझसे है सीधा सरोकार!*

*कहा विधाता ने 'नक्कू' जी,*
*दिन तेरा भी एक दिन आएगा,*
*सिर की पगड़ी भूलके इंसा,*
*बस तुझको ही ढकता जाएगा*

*फला विधाता का वरदान,*
*देखो नाक की बदली शान,*
*अब नाक की टोपी सर्वोपरि है,*
*बिन इसके खतरे में जान !*
*इस युग में नाक तू सबसे ऊपर,*
*तुझ से जीवन के आयाम,*

*भांति भांति के आवरण (मास्क) तेरे,*
*सुबह शाम के प्राणायाम !*
*इस पगड़ी-टोपी के झंझट में,*
*हुआ हम सब का काम तमाम,*
*अब नाक बचाने को केवल,*
*नाक ढके घूम रहा इंसान !!*
👳‍♂️😷

Tuesday, June 16, 2020

Your password can change your life

😊 *Your password can change your life.* 

*How a Password Changed a Life - A true story* from the Reader’s Digest ...

*He was having an average  morning until he sat down in front of my office computer. “your password has expired”, a server message flashed on his screen, with instructions for changing it...*

*In his company they have to change passwords every month as a precaution.*
 
He was deeply depressed after his recent divorce. Disbelief over what she had done to him was what he thought all day long ....

Just then he remembered a tip he had heard from his former boss. 

*He’d said, “I’m going to use a password that is going to change my life”.*

He couldn’t focus on getting things done in his current mood.. his  password reminded him that he shouldn’t let himself be a victim of his recent breakup and that he was strong enough to do something about it.

He made his password – *Forgive@her* .. he had to type this password several times every day, each time his computer would lock. Each time he came back from lunch he wrote ‘forgive @ her’.. 
The simple but mandatory action changed the way he looked at his ex-wife.. That constant reminder of reconciliation led him to accept the way things happened and helped him deal with his depression.. 
By the time the server prompted him to change his password the following month, he felt free.

*The next time he had to change his password, he thought about the next thing that he had to get done.* His new password - *Quit@smoking4ever*. 
It motivated him to follow his goal and he was able to quit smoking.

One month later, his password became *Save4trip@europe*, and in three months time he was able to visit Europe.

*Reminders helped him materialize his goals and kept  him motivated and excited,* it's sometimes difficult to come up with your next goal.. 

*Keeping at it passwords brings great results.*

After a few months his password was -
*lifeis#beautiful* !!! Life  going to change again...

*Moral of the Story*

*Your internal talks matter what you tell yourself. It conditions you to think in that direction and you are able to witness realtime RESULTS.*

Stay fit 🚶🏿‍♂and healthy🏃‍♂

*Dear Friends, this concept is really true,  it actually WORKS*.
*See for yourself and Change Your Password Now and Use a Constructive Goal to be achieved.*